(लखनऊ,UP)04नवंबर,2025.
नेशनल कोआर्डिनेशन कमेटी ऑफ इलेक्ट्रिसिटी इंप्लाइज एंड इंजीनियर्स (एनसीसीओईईई) की मुंबई में हुई बैठक में तय किया गया कि बिजली (संशोधन) विधेयक 2025 का हर स्तर पर विरोध होगा। बिजली कर्मचारी और इंजीनियर 30 जनवरी 2026 को दिल्ली में बिजली निजीकरण और बिजली (संशोधन) विधेयक 2025 के खिलाफ देशव्यापी प्रदर्शन करेंगे। इससे पहले 14 दिसंबर को नई दिल्ली में किसानों, बिजली कर्मियों और उपभोक्ताओं के संयुक्त मोर्चे की बैठक होगी। इसके लिए 15 नवंबर से राज्यवार सम्मेलन शुरू किए जाएंगे।
मुंबई में सोमवार को हुई एनसीसीओईईई की बैठक में देशभर के बिजली अभियंताओं और कर्मचारी संगठनों के पदाधिकारियों ने हिस्सा लिया। सभी ने देशभर में चल रहे बिजली निजीकरण प्रस्ताव की निंदा की। चेतावनी दी कि निजीकरण की प्रक्रिया नहीं रोकी गई तो वे उग्र प्रदर्शन करेंगे। तय किया गया कि यदि केंद्र सरकार उनकी आवाज नहीं सुनेगी तो देशभर के बिजली कर्मचारी और इंजीनियर देशव्यापी आंदोलन के लिए मजबूर होंगे। देशव्यापी आंदोलन की तैयारी के लिए 15 नवंबर से 25 जनवरी तक सभी राज्यों में बिजली कर्मचारियों, किसानों और उपभोक्ताओं के सम्मेलन होंगे। फिर 30 जनवरी को दिल्ली में रैली होगी। ऑल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन के चेयरमैन शैलेंद्र दुबे और महासचिव पी. रत्नाकर राव ने बताया कि बैठक में तय किया गया कि सभी राज्यों में नवंबर, दिसंबर और जनवरी में राज्य स्तरीय संयुक्त सम्मेलन होंगे।
इन बिंदुओं पर भी आपत्ति:
बैठक में विधेयक के कई बिंदुओं पर आपत्ति जताई है। वक्ताओं ने कहा कि संशोधन विधेयक में धारा 61(जी) में संशोधन प्रस्तावित है जिससे अगले पांच वर्षों में क्रॉस-सब्सिडी खत्म कर दी जाएगी। साथ ही, विधेयक में प्रावधान है कि बिजली टैरिफ लागत-प्रतिबिंबी होना चाहिए। यानी किसी भी उपभोक्ता को लागत से कम कीमत पर बिजली आपूर्ति नहीं की जानी चाहिए। इसका मतलब है कि किसानों को 6.5 हॉर्सपावर पंप के लिए यदि वह प्रतिदिन छह घंटे चलता है तो उसे कम से कम 12000 रुपये प्रति माह बिजली बिल देना होगा। गरीबी रेखा से नीचे के उपभोक्ताओं के लिए बिजली दरें कम से कम 10-12 रुपये प्रति यूनिट हो जाएंगी। वर्चुअल पावर मार्केट और मार्केट आधारित ट्रेडिंग सिस्टम पर भी आपत्ति जताई गई। वक्ताओं ने कहा, बिजली संविधान के मुताबिक बिजली मामलों में केंद्र और राज्य सरकारों के समान अधिकार हैं। इस संशोधन विधेयक के माध्यम से केंद्र सरकार बिजली मामलों में राज्यों के अधिकार छीन रही है। यह संघीय ढांचे और संविधान की भावना के खिलाफ है।(साभार एजेंसी)
