चुनाव टलने पर “प्रधान” ही संभालेंगे “गांव की सरकार”

UP / Uttarakhand

(लखनऊ,UP)25मई,2026

उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव टलने के बीच योगी सरकार ने एक बड़ा और अहम फैसला लिया है, जो राज्य की पंचायत व्यवस्था में ऐतिहासिक बदलाव माना जा रहा है। अब चुनाव होने तक गांवों की कमान ग्राम प्रधानों के हाथ में ही रहेगी। मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ ने पंचायती राज विभाग के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है, जिसके तहत पहली बार राज्य में प्रधानों को ही “प्रशासक” बनाकर गांवों का संचालन कराया जाएगा।

यह फैसला ऐसे समय में लिया गया है जब ओबीसी आरक्षण से जुड़े मुद्दों के कारण त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव समय पर नहीं हो सके हैं। हालांकि ओबीसी आयोग का गठन हो चुका है, लेकिन आरक्षण की प्रक्रिया तय करने और चुनाव की तैयारियां पूरी करने में अभी कई महीने लग सकते हैं। इस बीच 26 मई को मौजूदा पंचायतों का कार्यकाल समाप्त हो रहा है, जिससे प्रशासनिक शून्यता की स्थिति पैदा हो सकती थी।

प्रधान बनेंगे प्रशासक,समिति के साथ करेंगे काम
नई व्यवस्था के तहत मौजूदा ग्राम प्रधान अब प्रशासक की भूमिका निभाएंगे। उनके साथ एक समिति भी गठित की जाएगी, जो गांवों में विकास कार्यों को आगे बढ़ाने में सहयोग करेगी। इस दौरान पहले से चल रही योजनाएं जारी रहेंगी और जरूरत के अनुसार नए विकास कार्य भी शुरू किए जा सकेंगे।

पहले क्या होती थी व्यवस्था?
अब तक जब भी पंचायत चुनाव समय पर नहीं हो पाते थे, तब सरकार गांवों में एडीओ पंचायत या ग्राम सचिव को प्रशासक नियुक्त करती थी। ऐसी स्थिति में ग्राम प्रधानों के सभी वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार समाप्त हो जाते थे। लेकिन इस बार सरकार ने इस परंपरा को बदलते हुए प्रधानों को ही जिम्मेदारी देने का फैसला किया है। यह मॉडल पहले मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में देखा जा चुका है, जहां प्रधानों को ही प्रशासक बनाकर काम कराया जाता है। अब उत्तर प्रदेश में भी पहली बार इसी तर्ज पर व्यवस्था लागू की जा रही है।

क्यों टले पंचायत चुनाव?
पंचायत चुनावों में देरी की मुख्य वजह ओबीसी आरक्षण से जुड़ा मुद्दा है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार आरक्षण तय करने के लिए ट्रिपल टेस्ट प्रक्रिया अपनानी होती है। इसी को लेकर राज्य में नई प्रक्रिया शुरू की गई है, जिसमें समय लग रहा है। जब तक यह प्रक्रिया पूरी नहीं होती, तब तक चुनाव कराना संभव नहीं है।

गांवों के विकास पर क्या होगा असर?
विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से गांवों में विकास कार्यों की रफ्तार बनी रहेगी। पहले जहां प्रशासक बदलने से योजनाएं प्रभावित होती थीं, वहीं अब स्थानीय प्रधान के पास जिम्मेदारी होने से काम में निरंतरता आएगी। हालांकि, कुछ जानकार यह भी मानते हैं कि इस व्यवस्था में पारदर्शिता और निगरानी सुनिश्चित करना जरूरी होगा, ताकि प्रशासनिक शक्तियों का सही उपयोग हो सके।(साभार एजेंसी)

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