(नई दिल्ली)13जून,2026
रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) के हवाई प्रणाली केंद्र (बंगलूरू) में 25 जून को नेत्रा हवाई चेतावनी और नियंत्रण प्रणाली को संचालन की अंतिम मंजूरी (एफओसी) देने का कार्यक्रम आयोजित होगा।
एफओसी वह अंतिम चरण होता है, जिसमें किसी विमान या सैन्य प्रणाली को सभी जरूरी परीक्षणों और मानकों को पूरा करने के बाद पूरी तरह से मिशन के लिए तैयार घोषित किया जाता है। यह संचालन की प्रारंभिक मंजूरी (आईओसी) के बाद आता है। इसका मतलब होता है कि प्रणाली अब पूरी तरह से युद्ध के लिए तैयार है।
डीआरडीओ के मुताबिक, यह परियोजना इसलिए शुरू किया गया था ताकि भारतीय वायुसेना के लिए ऐसे विमान बनाए जा सकें जो हवा में उड़ते हुए दूर से ही खतरे का पता लगा लें और बाकी सभी जरूरी काम करने वाली प्रणालियां भी तैयार की जा सकें।
एईडब्ल्यूएंडसी प्रणाली क्या है?
इस प्रणाली (एईडब्ल्यूएंडसी) में विमान पर खास सेंसर लगे होते हैं। ये सेंसर हवा में उड़ते विमान और समुद्र की सतह पर मौजूद लक्ष्यों की पहले से चेतावनी देते हैं और दुश्मन के संकेतों का पता लगाते हैं। यह प्रणाली विमान के अंदर मौजूद ऑपरेटरों और जमीन पर स्थिति केंद्रों को विस्तृत जानकारी देती है, ताकि वायु रक्षा का काम सही तरीके से और मिलकर किया जा सके।
नेत्रा प्रणाली का विकास
इस परियोजना के तहत एम्ब्रेयर ईएमबी-145 विमान को आधार बनाकर उसमें जरूरी उड़ान और मिशन से जुड़े उपकरण जोड़े गए हैं और इस तरह नेत्रा हवाई चेतावनी और नियंत्रण प्रणाली तैयार की गई है। इस परियोजना के तहत तीनों विमानों में ये मिशन प्रणालियां लगाई जा चुकी हैं।
इस प्रणाली के परीक्षणों में भारतीय वायुसेना ने भी पूरी तरह हिस्सा लिया। तीनों विमान पहले ही शुरुआती स्तर की पूरी तैयार स्थिति में वायुसेना को सौंप दिए गए हैं। भारत अभी नेत्रा हवाई चेतावनी और नियंत्रण प्रणाली के साथ-साथ आईएल-76 विमान पर आधारित फाल्कन हवाई चेतावनी और नियंत्रण प्रणाली भी संचालित करता है।
फाल्कन और अवॉक्स प्रणाली
फाल्कन प्रणाली आईएल-76 विमानों पर लगाया गई है। यह आधुनिक रडार से लैस है और लंबी दूरी तक हवाई तथा सतही खतरों का पता लगा सकता है, जिसमें क्रूज मिसाइलें और विमान शामिल हैं। अवॉक्स प्लेटफॉर्म आधुनिक हवाई अभियानों में एक ‘फोर्स मल्टीप्लायर’ की तरह काम करते हैं, जो रियल-टाइम निगरानी, कमान और नियंत्रण तथा बेहतर स्थिति की जानकारी प्रदान करते हैं। ये प्रणालियां न केवल रक्षा बल्कि आक्रामक अभियानों में भी सहायता करती हैं और तेजी से प्रतिक्रिया देने में मदद करती हैं।(साभार एजेंसी)
