(जयपुर,राजस्थान)03जुलाई,2026
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राजस्थान के बालोतरा जिले के पचपदरा में देश की पहली ग्रीनफील्ड इंटीग्रेटेड रिफाइनरी राष्ट्र को समर्पित की है। यह भारत के ऊर्जा और पेट्रोकेमिकल क्षेत्र की बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है। यह परियोजना हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (एचपीसीएल) और राजस्थान सरकार का संयुक्त उपक्रम है। 90 लाख मीट्रिक टन प्रति वर्ष (एमटीपीए) क्षमता वाली इस ग्रीनफील्ड रिफाइनरी-कम-पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स को 79,450 करोड़ रुपये से अधिक की लागत से विकसित किया गया है।
ग्रीनफील्ड रिफाइनरी:
ग्रीनफील्ड रिफाइनरी वह होती है, जिसे पूरी तरह नई जगह पर शुरू से बनाया जाता है। पचपदरा परियोजना भी इसी तरह विकसित की गई है। इसका निर्माण 2018 में शुरू हुआ था और अब यह व्यावसायिक उत्पादन के लिए तैयार है। यह भारत की पहली ग्रीनफील्ड रिफाइनरी है, जिसे पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स के साथ विकसित किया गया है, और यह देश की 24वीं रिफाइनरी भी है
यह अत्याधुनिक कॉम्प्लेक्स रिफाइनिंग और पेट्रोकेमिकल उत्पादन को एक साथ जोड़ता है। इसकी पेट्रोकेमिकल उत्पादन क्षमता 2.4 एमएमटीपीए (मिलियन मीट्रिक टन प्रति वर्ष) है। रिफाइनरी का नेल्सन कॉम्प्लेक्सिटी इंडेक्स (एनसीआई) 17.0 है और इसकी पेट्रोकेमिकल यील्ड 26 प्रतिशत से अधिक है, जो वैश्विक मानकों के अनुरूप है।
नेल्सन कॉम्प्लेक्सिटी इंडेक्स किसी रिफाइनरी की तकनीकी क्षमता और आधुनिकता को मापने वाला पैमाना है। इससे पता चलता है कि कोई रिफाइनरी कच्चे तेल को कितनी कुशलता से अधिक मूल्य वाले उत्पादों में बदल सकती है। वहीं पेट्रोकेमिकल यील्ड का मतलब है कि रिफाइनरी में प्रोसेस किए गए कुल कच्चे तेल में से कितना हिस्सा पेट्रोकेमिकल उत्पादों (जैसे पॉलीप्रोपाइलीन, पॉलिमर और अन्य रसायन) के रूप में निकाला जा सकता है।
रिफाइनरी की प्रमुख विशेषताएं:
यह रिफाइनरी लगभग 4,400 एकड़ क्षेत्र में फैली है और इसका परिसर करीब 32 किलोमीटर की दूरी तक फैला है।
इसकी वार्षिक कच्चा तेल प्रोसेसिंग क्षमता 90 लाख मीट्रिक टन प्रति वर्ष है।
इसमें कुल 13 प्रसंस्करण इकाई हैं, जिनमें नौ रिफाइनरी और चार पेट्रोकेमिकल इकाई शामिल हैं।
अधिकारियों के अनुसार, रिफाइनरी को इस तरह डिजाइन किया गया है कि कच्चे तेल से अधिकतम मूल्य प्राप्त किया जा सके।
सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए परिसर में तीन समर्पित फायर स्टेशन बनाए गए हैं।
इसे 27 एपीआई ग्रेड के कच्चे तेल को प्रोसेस करने के लिए डिजाइन किया गया है।
यह अरब मिक्स सहित अलग-अलग ग्रेड के कच्चे तेल को जरूरत के अनुसार मिलाकर रिफाइन कर सकती है।
कच्चा तेल कहां से आएगा?
रिफाइनरी को हर साल 90 लाख मीट्रिक टन कच्चे तेल की जरूरत होगी।
इसमें से करीब 15 लाख टन कच्चा तेल राजस्थान के मंगला टर्मिनल से आएगा।
बाकी 75 लाख टन कच्चा तेल गुजरात के मुंद्रा पोर्ट के जरिए आयात किया जाएगा।
मुंद्रा से पचपदरा तक कच्चा तेल समर्पित पाइपलाइन नेटवर्क के जरिए पहुंचाया जाएगा।
तैयार ईंधन कहां जाएगा?
रिफाइनरी में बनने वाला पेट्रोल और डीजल एचपीसीएल की पाइपलाइन के जरिए गुजरात के पालनपुर तक भेजा जाएगा। वहां से इसे देशभर में वितरित किया जाएगा।
खास हीटिंग पाइपलाइन क्यों बिछाई गई?:
कच्चे तेल की प्रकृति वैक्स (मोम जैसी) होती है। इसे पाइपलाइन में जमने से रोकने के लिए मुंद्रा से पचपदरा तक विशेष हीटिंग पाइपलाइन बिछाई गई है। इसमें जगह-जगह हीटिंग स्टेशन और थर्मल इंसुलेशन लगाया गया है, जिससे तेल का तापमान बना रहेगा।
रिफाइनरी के फायदे होंगे?
यह भारत की ईंधन जरूरत का करीब 9-10 प्रतिशत हिस्सा पूरा करने की क्षमता रखती है।
भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूती मिलेगी।
पेट्रोकेमिकल क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ेगी।
पेट्रोकेमिकल और प्लास्टिक पार्क के विकास को बढ़ावा मिलेगा।
डाउनस्ट्रीम और सहायक उद्योग विकसित होंगे।
राजस्थान में औद्योगिक विकास को गति मिलेगी।
निर्माण के दौरान करीब एक लाख लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार मिला, आगे भी रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।
पश्चिमी भारत ईंधन उत्पादन और वितरण का महत्वपूर्ण केंद्र बनेगा।
राजस्थान केवल कच्चा तेल निकालने वाला राज्य नहीं रहेगा, बल्कि उसे प्रोसेस कर पॉलीप्रोपाइलीन, पॉलिमर जैसे वैल्यू-एडेड उत्पाद बनाने वाला हब बनेगा। इससे स्थानीय स्तर पर प्लास्टिक और केमिकल उद्योगों को बढ़ावा मिलेगा।
राजस्थान के लिए है गेमचेंजर?
विशेषज्ञों के अनुसार, पचपदरा रिफाइनरी सिर्फ एक एनर्जी प्रोजेक्ट नहीं है, बल्कि यह कई बड़े आर्थिक क्षेत्रों के लिए एक कैटलिस्ट (उत्प्रेरक) का काम करेगी। इसका असर पेट्रोकेमिकल, मैन्युफैक्चरिंग, लॉजिस्टिक्स, प्लास्टिक, केमिकल और एमएसएमई जैसे कई सेक्टरों पर देखने को मिलेगा। इससे पश्चिमी राजस्थान में औद्योगिक गतिविधियों को नई रफ्तार मिलेगी और एक ऐसा इंडस्ट्रियल इकोसिस्टम विकसित होगा, जो आने वाले वर्षों में पूरे क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे सकता है।
रोजगार के लिहाज से भी इस परियोजना का असर दो स्तरों पर देखने को मिलेगा। पहला, निर्माण चरण के दौरान हजारों लोगों को सीधे तौर पर काम मिला है। दूसरा, रिफाइनरी के संचालन के साथ हाई-स्किल्ड जॉब्स के नए अवसर तैयार होंगे। इसके अलावा ट्रांसपोर्ट, सर्विस, कैटरिंग और मेंटेनेंस जैसे क्षेत्रों में भी बड़ा मल्टीप्लायर इफेक्ट देखने को मिलेगा, जिससे लंबे समय में यह पूरा इलाका एक प्रमुख इंडस्ट्रियल एम्प्लॉयमेंट हब के रूप में विकसित हो सकता है। रिफाइनरी के आसपास स्थानीय स्तर पर भी आर्थिक गतिविधियां तेज होने की उम्मीद है। बिल्डर और कंस्ट्रक्शन सेक्टर, एजुकेशन, फूड सर्विसेज, सप्लाई चेन तथा छोटे-बड़े सर्विस सेक्टर में नए अवसर पैदा होंगे।
उद्घाटन पहले क्यों टल गया था?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 21 अप्रैल को इस रिफाइनरी का उद्घाटन करने वाले थे। लेकिन उद्घाटन से एक दिन पहले 20 अप्रैल को सीडीयू-वीडीयू यूनिट में लीकेज होने से आग लग गई। इसके बाद प्रधानमंत्री का उद्घाटन दौरा स्थगित कर दिया गया।
लीलाना से पचपदरा कैसे पहुंची रिफाइनरी?
शुरुआत में रिफाइनरी बालोतरा के बायतु के लीलाना गांव में लगनी तय थी। घोषणा होते ही राजनीतिक रसूख वाले लोगों और भूमाफिया ने वहां हजारों बीघा जमीन औने-पौने दाम पर खरीद ली। जब सरकार जमीन अधिग्रहित करने पहुंची तो किसानों ने जमीन देने से इनकार कर दिया। कुछ किसानों ने एक बीघा जमीन के बदले एक करोड़ रुपये की मांग रख दी। इसके बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने पचपदरा का रुख किया, जहां सरकारी जमीन उपलब्ध थम
पचपदरा रिफाइनरी की सबसे बड़ी खासियत इसका नेल्सन कॉम्प्लेक्सिटी इंडेक्स (NCI) लगभग 17 है। तकनीकी भाषा में इसका मतलब है कि यह देश की सबसे उन्नत और हाई-कन्वर्जन रिफाइनरियों में शामिल है।
यह दुनिया के किसी भी हिस्से से आने वाले भारी और निम्न गुणवत्ता वाले कच्चे तेल को भी पेट्रोल, डीजल और पेट्रोकेमिकल उत्पादों में बदलने की क्षमता रखती है।
आत्मनिर्भर भारत के तहत इस रिफाइनरी के अधिकांश रिएक्टर, कॉलम और भारी टैंक भारत में ही बनाए गए हैं।
इसके कंट्रोल सिस्टम और हाई-प्रेशर कंप्रेसर के लिए अमेरिका, जापान और यूरोप की तकनीक का इस्तेमाल किया गया है।
वेल्डिंग और फिनिशिंग की गुणवत्ता को अंतरराष्ट्रीय स्तर का बनाए रखने के लिए नीदरलैंड के तकनीशियनों ने भी यहां काम किया।
इस मेगा प्रोजेक्ट में इंजीनियर्स इंडिया ने प्रमुख भूमिका निभाई है। वहीं लमस टेक्नोलॉजी, यूओपी और यूनिवेशन टेक्नोलॉजीज जैसी वैश्विक कंपनियों ने पेट्रोकेमिकल और क्रैकर यूनिट की तकनीक उपलब्ध कराई है।
इस मेगा प्रोजेक्ट के निर्माण के दौरान 1.5 करोड़ घन मीटर मिट्टी हटाई गई, जो लगभग 15 हजार ओलंपिक आकार के स्विमिंग पूल भरने के बराबर है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार यह खुदाई गीजा के पिरामिड के निर्माण से करीब छह गुना अधिक है।
रिफाइनरी के निर्माण में 16 लाख घन मीटर कंक्रीट का इस्तेमाल किया गया, जो बुर्ज खलीफा के निर्माण में लगे कंक्रीट से लगभग पांच गुना अधिक है।
वहीं करीब 3 लाख मीट्रिक टन स्टील का उपयोग हुआ, जो एफिल टॉवर में इस्तेमाल स्टील से करीब 40 गुना ज्यादा है।
पूरे परिसर में 28 हजार किलोमीटर लंबी केबल बिछाई गई है, जिसकी लंबाई पृथ्वी के व्यास से भी दोगुनी है।
इसके अलावा रिफाइनरी में बना 125 मीटर ऊंचा कोक डोम अपनी तरह का अनूठा ढांचा है, जिसे गोल गुम्बज से लगभग तीन गुना बड़ा बताया जाता है।(साभार एजेंसी)
