(नई दिल्ली)30अप्रैल,2026.
पश्चिम एशिया संघर्ष के मद्देनजर अगले महीने 14-15 मई को भारत की मेजबानी में हो रही ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक की अहमियत काफी बढ़ गई है।
माना जा रहा है कि इस बैठक में ईरान, रूस और चीन की तरफ से भारत पर जबरदस्त दबाव बनाने की कोशिश होगी ताकि ब्रिक्स की तरफ से ईरान पर अमेरिका-इजरायल के हमले और इन्हें मदद करने वाले देशों के खिलाफ निंदा प्रस्ताव पारित हो सके।
ईरान लगातार इस बात की मांग कर रहा है कि ब्रिक्स उसके समर्थन में बयान जारी करे। अभी पिछले हफ्ते ही ब्रिक्स के उप विदेश मंत्रियों व ब्रिक्स के पश्चिम एशिया व उत्तरी अफ्रीका के प्रतिनिधियों की बैठक में भी ईरान ने यह मांग की थी, जिस पर सहमति नहीं बन सकी थी।
लिहाजा संयुक्त बयान जारी नहीं हो पाया था। कोई आश्चर्य नहीं कि विदेश मंत्रियों की बैठक का हश्र भी कुछ ऐसा ही हो।बुधवार को रूस के विदेश मंत्रालय की तरफ से यह जानकारी दी गई है कि ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक में हिस्सा लेने के लिए विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव नई दिल्ली आएंगे।
सूत्रों के मुताबिक, चीन के विदेश मंत्री वांग यी और ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची के अलावा अन्य सभी सदस्य देशों के विदेश मंत्रियों के भी इसमें हिस्सा लेने की संभावना है।
बुधवार को विदेश मंत्री एस जयशंकर और अराघची के बीच टेलीफोन पर हुई वार्ता में भी ब्रिक्स एजेंडे पर चर्चा होने की बात की गई है।
ईरान के विदेश मंत्री ने मार्च, 2026 में भी जयशंकर से बात की थी और इसके बाद जारी बयान में साफ किया था कि ब्रिक्स को मौजूदा संकट में ज्यादा रचनात्मक भूमिका निभानी चाहिए।
यही वजह है कि इस बार ईरान, रूस और चीन की तरफ से ‘एकजुट मोर्चा’ बनाकर भारत को घेरा जा सकता है। पश्चिम एशिया संघर्ष में रूस और चीन की तरफ से ईरान को पूरा समर्थन दिया जा रहा है।
इस पूरे मामले में भारत के विदेश मंत्रालय का रुख अब तक साफ और संतुलित रहा है। प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने 27 अप्रैल को कहा है कि संयुक्त बयान जारी करना संभव नहीं हो सका, क्योंकि सदस्य देशों के बीच पश्चिम एशिया संघर्ष को लेकर सामान्य सहमति नहीं बन सकी।
संयुक्त बयान हासिल नहीं हो सका है।भारत ने पहले भी कहा है कि ब्रिक्स को विकास, बहुपक्षीयता और आर्थिक सहयोग का मंच बनाए रखना चाहिए(साभार)
