बदलती जीवन शैली,स्वस्थ हृदय की बढ़ती चुनौती

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(नई दिल्ली )29सितंबर 2026

मनुष्य के शरीर में हृदय केवल रक्त पंप करने वाला अंग नहीं, बल्कि जीवन की निरंतरता का आधार है। यह लगातार धड़कते हुए शरीर के प्रत्येक हिस्से तक ऑक्सीजन और पोषक तत्व पहुंचाता है। इसलिए हृदय का स्वस्थ रहना संपूर्ण शारीरिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है। आधुनिक जीवन शैली में आए बदलावों ने हृदय स्वास्थ्य से जुड़ी चुनौतियों को बढ़ाया है। लंबे समय तक बैठे रहना, शारीरिक गतिविधि की कमी, असंतुलित खान-पान, अधिक नमक और चीनी का सेवन, धूम्रपान, तंबाकू, तनाव, अपर्याप्त नींद और वायु प्रदूषण जैसे कारक हृदय रोगों के जोखिम को बढ़ा सकते हैं। उच्च रक्तचाप, मधुमेह, बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल और मोटापा भी ऐसे प्रमुख जोखिम कारक हैं, जो लंबे समय तक बिना स्पष्ट लक्षणों के बने रह सकते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार हृदय एवं रक्त वाहिका संबंधी रोग दुनिया में मृत्यु का प्रमुख कारण हैं। वर्ष 2022 में इन रोगों से करीब 1.98 करोड़ लोगों की मृत्यु हुई, जो वैश्विक मौतों का लगभग 32 प्रतिशत है। इनमें लगभग 85 प्रतिशत मौतें हार्ट अटैक और स्ट्रोक के कारण हुईं। इन मौतों का बड़ा हिस्सा निम्न और मध्यम आय वाले देशों में दर्ज होता है। इसी वैश्विक चुनौती के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए हर वर्ष 29 सितंबर को विश्व हृदय दिवस मनाया जाता है। इसका उद्देश्य लोगों को हृदय रोगों के जोखिम, बचाव, समय पर जांच और स्वस्थ जीवन शैली के प्रति जागरूक करना है। स्वस्थ हृदय के लिए नियमित शारीरिक गतिविधि, संतुलित आहार, पर्याप्त नींद और समय पर स्वास्थ्य जांच को जीवन का हिस्सा बनाना आवश्यक है।

हृदय रोग केवल बुजुर्गों की समस्या नहीं

एक समय हृदय रोगों को मुख्य रूप से उम्र बढ़ने से जुड़ी समस्या माना जाता था, लेकिन अब तस्वीर बदल रही है। उम्र निश्चित रूप से हृदय रोग का एक महत्वपूर्ण जोखिम कारक है, लेकिन इसके साथ जीवन शैली, आनुवंशिकता, रक्तचाप, रक्त शर्करा, कोलेस्ट्रॉल, वजन, तंबाकू और शारीरिक निष्क्रियता भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। भारत जैसे तेजी से शहरीकरण और आर्थिक बदलाव वाले देश में जीवन शैली से जुड़े जोखिमों का महत्व बढ़ गया है। WHO के भारत संबंधी आंकड़ों में 2021 के लिए इस्केमिक हार्ट डिजीज प्रमुख मृत्यु कारणों में शामिल थी। उसी वर्ष भारत में गैर-संचारी रोगों का कुल मौतों में हिस्सा लगभग 49 प्रतिशत आंका गया था। इसलिए हृदय स्वास्थ्य की चर्चा को केवल अस्पताल, दवा और ऑपरेशन तक सीमित रखना पर्याप्त नहीं है। इसे बचपन से स्वस्थ आदतों, नियमित जांच और बीमारी से पहले जोखिम पहचानने की संस्कृति से जोड़ना आवश्यक है।

हृदय रोगों का व्यापक स्वरूप

हृदय रोग एक ही बीमारी का नाम नहीं है। हृदय और रक्त वाहिकाओं को प्रभावित करने वाली कई स्थितियां इसके अंतर्गत आती हैं। इनमें कोरोनरी आर्टरी डिजीज, हार्ट अटैक, हार्ट फेल्योर, हृदय की धड़कन में अनियमितता, वाल्व संबंधी रोग, जन्मजात हृदय रोग तथा उच्च रक्तचाप से संबंधित हृदय समस्याएं शामिल हैं। स्ट्रोक सीधे हृदय की बीमारी नहीं है, लेकिन यह हृदय-रक्त वाहिका तंत्र से गहराई से जुड़ा है। रक्त वाहिका में रुकावट या अन्य कारणों से मस्तिष्क तक रक्त और ऑक्सीजन की आपूर्ति बाधित होने पर स्ट्रोक हो सकता है। इसलिए हृदय और रक्त वाहिका स्वास्थ्य को एक व्यापक प्रणाली के रूप में समझना जरूरी है।

उच्च रक्तचाप : बिना शोर का बड़ा जोखिम

उच्च रक्तचाप को अक्सर ‘साइलेंट किलर’ कहा जाता है क्योंकि कई लोगों में इसके स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते। लंबे समय तक अनियंत्रित रक्तचाप हृदय, मस्तिष्क, गुर्दे और आंखों सहित कई अंगों पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है। WHO के उपलब्ध भारत प्रोफाइल के अनुसार 2019 में भारत में अनुमानित 25.66 लाख नहीं, बल्कि लगभग 2.566 मिलियन हृदय-रक्त वाहिका मौतें दर्ज अनुमान में थीं और इनमें उच्च सिस्टोलिक रक्तचाप का योगदान महत्वपूर्ण था। उसी प्रोफाइल में वयस्कों में नमक सेवन और शारीरिक निष्क्रियता जैसे जोखिम भी दर्ज किए गए हैं। इसलिए रक्तचाप को केवल तब जांचना उचित नहीं है जब सिरदर्द या कोई अन्य शिकायत हो। नियमित स्वास्थ्य जांच का हिस्सा बनाकर रक्तचाप की निगरानी की जानी चाहिए।

कोलेस्ट्रॉल, मधुमेह और मोटापा का संबंध

शरीर में कोलेस्ट्रॉल की कुछ मात्रा आवश्यक होती है, लेकिन रक्त में विशेष रूप से LDL यानी कम घनत्व वाले लिपोप्रोटीन का बढ़ा स्तर रक्त वाहिकाओं में प्लाक बनने के जोखिम को बढ़ा सकता है। समय के साथ रक्त वाहिकाएं संकरी हो सकती हैं और हृदय तक रक्त पहुंचने में बाधा उत्पन्न हो सकती है। इसी तरह मधुमेह और बढ़ी हुई रक्त शर्करा भी हृदय-रक्त वाहिका जोखिम से जुड़ी है। मोटापा, विशेषकर पेट के आसपास जमा अतिरिक्त वसा, उच्च रक्तचाप, मधुमेह और असामान्य रक्त वसा जैसे कई जोखिमों के साथ जुड़ सकता है। WHO के अनुसार अस्वस्थ भोजन और शारीरिक निष्क्रियता जैसे व्यवहारिक जोखिम रक्तचाप, रक्त शर्करा, रक्त वसा और वजन बढ़ने जैसे मेटाबोलिक जोखिम कारकों में दिखाई दे सकते हैं, जो आगे चलकर हृदयाघात, स्ट्रोक और अन्य जटिलताओं का खतरा बढ़ाते हैं।

खान-पान : थाली से शुरू होती है हृदय की देखभाल

हृदय स्वास्थ्य के लिए किसी एक ‘सुपरफूड’ की तलाश करने के बजाय पूरे आहार की गुणवत्ता पर ध्यान देना अधिक महत्वपूर्ण है। भोजन में फल, सब्जियां, साबुत अनाज, दालें, फलियां, मेवे और उपयुक्त मात्रा में स्वस्थ वसा को शामिल किया जा सकता है। इसके विपरीत अत्यधिक नमक, चीनी, ट्रांस फैट और अस्वस्थ वसा वाले भोजन का सेवन सीमित करना जरूरी है। अत्यधिक प्रसंस्कृत और पैकेज्ड खाद्य पदार्थों का लगातार सेवन भी स्वस्थ आहार की अवधारणा के विपरीत जा सकता है। भारतीय भोजन में भी संतुलन संभव है। घर का साधारण भोजन- दाल, सब्जी, अनाज, सलाद, फल और आवश्यकतानुसार दूध या अन्य पौष्टिक खाद्य पदार्थ सही मात्रा और विविधता के साथ लिया जाए तो यह स्वस्थ जीवन शैली का हिस्सा बन सकता है। मुख्य बात भोजन के प्रकार, मात्रा और नियमितता का संतुलन है।

व्यायाम नहीं, नियमित शारीरिक सक्रियता जरूरी

हृदय को स्वस्थ रखने के लिए केवल जिम जाना जरूरी नहीं है। तेज चाल से चलना, साइकिल चलाना, तैरना, सीढ़ियों का उपयोग करना, घरेलू कामकाज और अन्य नियमित शारीरिक गतिविधियां भी उपयोगी हो सकती हैं। WHO वयस्कों के लिए सप्ताह में कम से कम 150 से 300 मिनट की मध्यम तीव्रता वाली एरोबिक शारीरिक गतिविधि या 75 से 150 मिनट की अधिक तीव्र गतिविधि की सलाह देता है। इसके अतिरिक्त सप्ताह में कम से कम दो दिन प्रमुख मांसपेशी समूहों को मजबूत करने वाली गतिविधियां भी उपयोगी मानी जाती हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि जो व्यक्ति अभी बिल्कुल सक्रिय नहीं है, वह अचानक अत्यधिक व्यायाम शुरू करने के बजाय अपनी क्षमता के अनुसार धीरे-धीरे गतिविधि बढ़ाए। किसी विशेष बीमारी या चिकित्सकीय स्थिति में व्यायाम की प्रकृति और मात्रा चिकित्सक की सलाह के अनुसार तय की जानी चाहिए।

लंबे समय तक बैठे रहना भी चुनौती

डिजिटल कार्य संस्कृति ने शारीरिक श्रम को काफी कम कर दिया है। कंप्यूटर, मोबाइल और अन्य स्क्रीन के सामने लगातार कई घंटे बैठना सामान्य हो गया है। समस्या केवल व्यायाम न करने की नहीं है; दिनभर अत्यधिक बैठे रहना भी स्वास्थ्य के लिए प्रतिकूल हो सकता है। इसलिए दैनिक जीवन में छोटे-छोटे बदलाव महत्वपूर्ण हैं। कुछ समय के अंतराल पर उठना, थोड़ी दूरी पैदल चलना, सीढ़ियों का उपयोग करना और काम के बीच शरीर को सक्रिय रखना उपयोगी आदतें हैं। WHO भी लंबे समय तक निष्क्रिय रहने के समय को कम करने और नियमित शारीरिक गतिविधि बढ़ाने पर जोर देता है।

तनाव और नींद का हृदय से संबंध

आज का जीवन तेज गति, प्रतिस्पर्धा और लगातार उपलब्ध रहने की मांग से जुड़ा है। काम का दबाव, आर्थिक चिंता, पारिवारिक जिम्मेदारियां और डिजिटल दुनिया से लगातार जुड़े रहना तनाव को बढ़ा सकते हैं। लगातार तनाव स्वस्थ दिनचर्या को प्रभावित कर सकता है और व्यक्ति की नींद, खान-पान तथा शारीरिक सक्रियता पर भी असर डाल सकता है। इसलिए हृदय स्वास्थ्य के लिए मानसिक स्वास्थ्य को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। पर्याप्त नींद, नियमित दिनचर्या, ध्यान, योग, सामाजिक संबंध और मनोरंजन के लिए समय निकालना तनाव प्रबंधन का हिस्सा हो सकता है। इसका उद्देश्य किसी बीमारी का स्वयं उपचार करना नहीं, बल्कि स्वस्थ जीवन शैली को मजबूत करना है।

धूम्रपान और तंबाकू से रखें दूरी

तंबाकू हृदय और रक्त वाहिकाओं के लिए प्रमुख जोखिम कारकों में है। धूम्रपान रक्त वाहिकाओं और हृदय-रक्त संचार प्रणाली को नुकसान पहुंचा सकता है। तंबाकू के धुएं का प्रभाव केवल धूम्रपान करने वाले व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि आसपास के लोगों पर भी पड़ता है। विश्व हृदय महासंघ लंबे समय से तंबाकू नियंत्रण और धूम्रपान छोड़ने को हृदय स्वास्थ्य के महत्वपूर्ण उपायों में शामिल करता रहा है। इसलिए हृदय दिवस का एक महत्वपूर्ण संदेश यह भी होना चाहिए कि तंबाकू छोड़ना केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य का निर्णय नहीं, बल्कि परिवार और समाज के स्वास्थ्य की रक्षा का कदम है।

महिलाओं में हृदय स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान

हृदय रोग को लंबे समय तक पुरुषों से अधिक जुड़ी समस्या के रूप में देखा जाता रहा, लेकिन महिलाओं में भी हृदय-रक्त वाहिका रोग गंभीर स्वास्थ्य चुनौती हैं। महिलाओं में लक्षणों की अभिव्यक्ति कुछ मामलों में अलग हो सकती है और वे कभी-कभी सीने में स्पष्ट दर्द के बजाय सांस फूलना, असामान्य थकान, मतली या अन्य लक्षण महसूस कर सकती हैं। गर्भावस्था से संबंधित कुछ स्वास्थ्य स्थितियां भविष्य में हृदय-रक्त वाहिका जोखिम से जुड़ सकती हैं। रजोनिवृत्ति के बाद भी स्वास्थ्य जोखिमों का नया आकलन आवश्यक हो सकता है। इसलिए महिलाओं को नियमित रक्तचाप, रक्त शर्करा, लिपिड और वजन की जांच के साथ अपने व्यक्तिगत जोखिमों पर चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए।

युवाओं में बढ़ती चुनौती

युवा अवस्था में हृदय रोग का नाम सुनकर अक्सर लोग इसे असामान्य मानते हैं। लेकिन कम उम्र में मोटापा, उच्च रक्तचाप, मधुमेह, तंबाकू सेवन, शारीरिक निष्क्रियता और खराब खान-पान जैसे जोखिम मौजूद हो सकते हैं। इसका समाधान युवाओं को डराना नहीं, बल्कि बचपन से स्वस्थ जीवन शैली को सामान्य बनाना है। स्कूलों और कॉलेजों में खेल, शारीरिक गतिविधि, पोषण शिक्षा और तंबाकू विरोधी जागरूकता को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।

पर्यावरण भी हृदय स्वास्थ्य का हिस्सा

हृदय की चर्चा केवल भोजन और व्यायाम तक सीमित नहीं होनी चाहिए। वायु प्रदूषण भी हृदय-रक्त वाहिका स्वास्थ्य से जुड़ा पर्यावरणीय जोखिम है। प्रदूषित हवा के लंबे समय तक संपर्क का संबंध हृदय और रक्त वाहिका संबंधी रोगों से पाया गया है। WHO भी वायु प्रदूषण को हृदय रोग और स्ट्रोक के महत्वपूर्ण पर्यावरणीय जोखिम कारकों में शामिल करता है। इसलिए स्वच्छ हवा, पैदल चलने योग्य शहर, सुरक्षित साइकिल मार्ग, खुले सार्वजनिक स्थान और हरित क्षेत्र केवल पर्यावरणीय सुविधाएं नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य की आवश्यकता भी हैं।

समय पर पहचान बचा सकती है जीवन

हृदय रोगों की रोकथाम का एक महत्वपूर्ण आधार नियमित स्वास्थ्य जांच है। रक्तचाप, रक्त शर्करा, HbA1c, लिपिड प्रोफाइल, वजन, कमर की परिधि और पारिवारिक इतिहास जैसी जानकारी व्यक्ति के जोखिम को समझने में मदद कर सकती है। हर व्यक्ति को एक जैसी जांच की आवश्यकता नहीं होती। उम्र, पारिवारिक इतिहास, मौजूदा बीमारी और अन्य जोखिमों के आधार पर चिकित्सक आवश्यक जांच तय कर सकते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी रिपोर्ट में असामान्यता आने पर स्वयं दवा शुरू करने के बजाय योग्य चिकित्सक से परामर्श किया जाए।

हार्ट अटैक के संकेतों को पहचानना जरूरी

हार्ट अटैक की स्थिति में समय अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। सीने में दबाव, जकड़न या दर्द, दर्द का हाथ, कंधे, पीठ, गर्दन या जबड़े तक जाना, सांस फूलना, अचानक पसीना, कमजोरी या मतली जैसे लक्षण चेतावनी के संकेत हो सकते हैं। हर व्यक्ति में लक्षण एक जैसे नहीं होते। इसलिए गंभीर या नए लक्षणों को केवल गैस, थकान या सामान्य कमजोरी मानकर नजरअंदाज करना उचित नहीं है। ऐसी स्थिति में तत्काल आपात चिकित्सा सहायता लेना जरूरी है।

CPR और प्राथमिक सहायता का महत्व

कार्डियक अरेस्ट और हार्ट अटैक एक ही स्थिति नहीं हैं। कार्डियक अरेस्ट में हृदय की प्रभावी पंपिंग अचानक रुक जाती है और व्यक्ति बेहोश हो सकता है तथा सामान्य रूप से सांस नहीं ले सकता। ऐसी स्थिति में तत्काल CPR और उपलब्ध होने पर AED का उपयोग जीवन बचाने में महत्वपूर्ण हो सकता है। समाज में अधिक से अधिक लोगों को बेसिक लाइफ सपोर्ट का प्रशिक्षण मिले तो आपात स्थिति में अस्पताल पहुंचने से पहले सहायता की क्षमता बढ़ सकती है। स्कूलों, कार्यालयों, सार्वजनिक संस्थानों और सामुदायिक संगठनों में प्राथमिक चिकित्सा प्रशिक्षण को बढ़ावा देना उपयोगी कदम हो सकता है।

आधुनिक चिकित्सा ने बदली उपचार की तस्वीर

हृदय रोगों के उपचार में पिछले दशकों में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। आधुनिक कार्डियोलॉजी में दवाओं के साथ एंजियोप्लास्टी, स्टेंट, बाईपास सर्जरी, पेसमेकर, इम्प्लांटेबल उपकरण और उन्नत इमेजिंग तकनीकों का उपयोग किया जाता है। लेकिन आधुनिक उपचार की उपलब्धता का अर्थ यह नहीं कि रोकथाम का महत्व कम हो गया है। उपचार के बाद भी जीवन शैली में बदलाव, दवाओं का नियमित सेवन, चिकित्सकीय निगरानी और पुनर्वास महत्वपूर्ण बने रहते हैं।

डिजिटल तकनीक और हृदय की निगरानी

स्मार्टवॉच और अन्य पहनने योग्य उपकरणों ने हृदय गति और शारीरिक गतिविधि की निगरानी को आसान बनाया है। कुछ उपकरण ECG जैसी सुविधाएं भी उपलब्ध कराते हैं। टेलीमेडिसिन और डिजिटल स्वास्थ्य प्रणालियां दूरदराज के क्षेत्रों में चिकित्सा सलाह की पहुंच बढ़ाने में उपयोगी हो सकती हैं। फिर भी डिजिटल उपकरण चिकित्सक का विकल्प नहीं हैं। किसी उपकरण में असामान्य रीडिंग आने पर उसका अर्थ व्यक्ति की पूरी चिकित्सकीय स्थिति के संदर्भ में समझना आवश्यक है। तकनीक का सही उपयोग जागरूकता और निगरानी को मजबूत कर सकता है, लेकिन निदान और उपचार के लिए चिकित्सकीय मूल्यांकन जरूरी रहता है।

आयुर्वेद, योग और समग्र स्वास्थ्य दृष्टि

भारतीय परंपरा में भोजन, दिनचर्या, शारीरिक सक्रियता और मानसिक संतुलन को स्वास्थ्य से जोड़ा गया है। योग और ध्यान तनाव प्रबंधन तथा शारीरिक सक्रियता की स्वस्थ दिनचर्या का हिस्सा बन सकते हैं। हालांकि किसी भी आयुर्वेदिक या हर्बल उत्पाद को केवल ‘प्राकृतिक’ होने के कारण पूरी तरह सुरक्षित मानना उचित नहीं है। विशेष रूप से यदि व्यक्ति पहले से हृदय, रक्तचाप, मधुमेह या अन्य बीमारी की दवा ले रहा हो तो किसी भी पूरक उपचार या उत्पाद के उपयोग से पहले चिकित्सकीय सलाह आवश्यक है। प्रमाण-आधारित आधुनिक उपचार को बिना सलाह के छोड़ना भी उचित नहीं है।

परिवार से शुरू हो सकती है हृदय की सुरक्षा

हृदय स्वास्थ्य का अभियान घर से शुरू हो सकता है। परिवार में भोजन की गुणवत्ता सुधारना, बच्चों को खेल के लिए प्रोत्साहित करना, बुजुर्गों की नियमित जांच कराना, घर को तंबाकू-मुक्त रखना और आपात स्थिति में प्राथमिक सहायता की जानकारी रखना छोटे लेकिन महत्वपूर्ण कदम हैं। यदि परिवार में कम उम्र में हृदय रोग, उच्च रक्तचाप, मधुमेह या अन्य संबंधित बीमारी का इतिहास रहा है तो चिकित्सक को इसकी जानकारी देना विशेष रूप से उपयोगी है। पारिवारिक इतिहास व्यक्ति के जोखिम आकलन का एक हिस्सा हो सकता है।

रोकथाम ही सबसे व्यापक रणनीति

हृदय रोगों की रोकथाम किसी एक उपाय से संभव नहीं है। इसके लिए कई स्तरों पर एक साथ काम करना आवश्यक है। व्यक्ति अपनी जीवन शैली सुधारे, परिवार स्वस्थ वातावरण बनाए, स्कूल और कार्यस्थल शारीरिक गतिविधि को प्रोत्साहित करें तथा स्वास्थ्य व्यवस्था समय पर जांच और उपचार उपलब्ध कराए। WHO के अनुसार व्यवहारिक और पर्यावरणीय जोखिमों को कम करने से हृदय-रक्त वाहिका रोगों की बड़ी संख्या को रोका जा सकता है। तंबाकू से दूरी, स्वस्थ भोजन, नियमित शारीरिक गतिविधि, वजन नियंत्रण और समय पर जोखिम कारकों की पहचान इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

भविष्य की चिकित्सा : व्यक्तिगत उपचार से कृत्रिम बुद्धिमत्ता तक

हृदय रोगों के क्षेत्र में शोध लगातार आगे बढ़ रहा है। व्यक्तिगत जोखिम आकलन, जीनोमिक्स, उन्नत इमेजिंग, पहनने योग्य उपकरण, दूरस्थ निगरानी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित विश्लेषण भविष्य में निदान और उपचार को और अधिक व्यक्तिगत बना सकते हैं। विश्व हृदय महासंघ की 2026 की रिपोर्ट में जन्मजात हृदय रोग पर विशेष ध्यान दिया गया है, जो यह दर्शाता है कि हृदय स्वास्थ्य का दायरा केवल जीवन शैली से उत्पन्न रोगों तक सीमित नहीं है। भविष्य की चिकित्सा में तकनीक जितनी महत्वपूर्ण होगी, उतना ही जरूरी होगा कि उसकी पहुंच समाज के सभी वर्गों तक हो। आधुनिक उपचार तभी व्यापक स्वास्थ्य लाभ में बदल सकता है जब समय पर जांच, आवश्यक दवाएं और विशेषज्ञ चिकित्सा जरूरतमंद लोगों तक उपलब्ध हों।

स्वस्थ आदतें ही हृदय की सबसे मजबूत सुरक्षा

विश्व हृदय दिवस केवल एक दिन हृदय के बारे में चर्चा करने का अवसर नहीं है। यह अपने दैनिक जीवन की उन आदतों पर विचार करने का अवसर है जो आने वाले वर्षों में हमारे स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती हैं। हृदय रोगों का बड़ा हिस्सा जोखिम कारकों की समय पर पहचान और स्वस्थ जीवन शैली से रोका या नियंत्रित किया जा सकता है। यही कारण है कि हृदय की सुरक्षा का अर्थ केवल बीमारी होने के बाद उपचार करना नहीं, बल्कि बीमारी से पहले स्वास्थ्य की रक्षा करना है। आज जब जीवन की गति तेज हो रही है और काम तथा मनोरंजन दोनों का बड़ा हिस्सा स्क्रीन से जुड़ गया है, तब शरीर को सक्रिय रखना पहले से अधिक जरूरी हो गया है। संतुलित भोजन, नियमित शारीरिक गतिविधि, पर्याप्त नींद, तनाव का बेहतर प्रबंधन, तंबाकू से दूरी, रक्तचाप और रक्त शर्करा की निगरानी तथा समय पर चिकित्सकीय जांच हृदय की सुरक्षा की मजबूत आधारशिला हैं। हृदय स्वास्थ्य व्यक्ति की निजी जिम्मेदारी जरूर है, लेकिन केवल व्यक्तिगत जिम्मेदारी नहीं। स्वस्थ भोजन की उपलब्धता, स्वच्छ हवा, सुरक्षित सार्वजनिक स्थान, शारीरिक गतिविधि के अवसर, प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच और आपात चिकित्सा व्यवस्था भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं। इसलिए स्वस्थ हृदय के लिए व्यक्ति, परिवार, समाज और स्वास्थ्य व्यवस्था सभी को मिलकर काम करना होगा। हृदय की धड़कन हमें हर क्षण यह याद दिलाती है कि जीवन निरंतर गति का नाम है। इस गति को स्वस्थ बनाए रखने के लिए बीमारी का इंतजार करने के बजाय आज से ही छोटे-छोटे बदलाव शुरू करना आवश्यक है। विश्व हृदय दिवस का वास्तविक संदेश यही है कि हृदय की देखभाल किसी एक दिन का संकल्प नहीं, बल्कि जीवनभर अपनाई जाने वाली स्वस्थ आदतों की निरंतर यात्रा है। यह आलेख एम्स, नई दिल्ली के कार्डियोलॉजी विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष तथा वर्तमान में मेट्रो ग्रुप ऑफ हॉस्पिटल्स में हृदय एवं रक्त वाहिका विज्ञान एवं अनुसंधान विभाग के प्रमुख डॉ. विनय कुमार बहल से हुई विस्तृत बातचीत पर आधारित है। इसमें हृदय रोगों के क्षेत्र में उनके दीर्घ चिकित्सकीय अनुभव, विशेषज्ञता और शोध-अनुभव से प्राप्त महत्वपूर्ण जानकारियों को समाहित किया गया है।(साभार डीडी न्यूज)

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