शैल चित्रों,भित्ति चित्रों को संरक्षित करने के निर्देश

Uttar Pradesh

(लखनऊ,UP)26सितंबर,2026

उत्तर प्रदेश की समृद्ध पुरातात्विक और कला विरासत को वैज्ञानिक तरीके से सहेजने की दिशा में अहम कदम उठाया गया है. राज्य के अपर मुख्य सचिव (संस्कृति, पर्यटन एवं धर्मार्थ कार्य) अमृत अभिजात की अध्यक्षता में राज्य पुरातत्व निदेशालय और नई दिल्ली स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (IGNCA) के अधिकारियों के बीच एक महत्वपूर्ण बैठक हुई. इसमें प्रदेश भर में शैलचित्रों और भित्ति चित्रों के संरक्षण, परिरक्षण और दस्तावेजीकरण को लेकर विस्तृत रूपरेखा तैयार की गई।

गौरतलब है कि संस्कृति मंत्रालय के अधीन कार्यरत IGNCA पिछले चार दशकों से शैलकला और भित्ति चित्रों के अध्ययन व संरक्षण के क्षेत्र में सक्रिय है. फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया, वियतनाम, इंडोनेशिया, इटली और चीन जैसे कई देशों के साथ मिलकर काम कर चुका है. दोनों संस्थाओं के बीच बीते 3 सितंबर 2025 को हुए समझौता ज्ञापन (MoU) के क्रियान्वयन की समीक्षा की गई और आगे की कार्ययोजना पर मंथन हुआ।

उत्तर प्रदेश राज्य पुरातत्व विभाग की निदेशक डॉ. रेनू त्रिवेदी ने जानकारी दी कि विभाग और IGNCA मिलकर प्रदेश की पारंपरिक ब्लॉक पेंटिंग और वॉल पेंटिंग को आधुनिक तकनीक से सुरक्षित करेंगे।

इसकी शुरुआत मथुरा, अलीगढ़ और बुंदेलखंड क्षेत्र में सर्वे से होगी. इसके बाद राज्य सरकार बजट आवंटित करेगी. उन्होंने चिंता जताई कि प्रदेश के कई जिलों में दीवारों, चट्टानों और पहाड़ी इलाकों में मौजूद बेशकीमती चित्रकलाएं धीरे-धीरे मिटती जा रही हैं, जिन्हें बचाना अब समय की मांग है।

इस योजना में यह भी तय हुआ कि संरक्षित स्मारकों में मौजूद 15वीं से 19वीं शताब्दी तक की प्राचीन चित्रकलाओं के वैज्ञानिक संरक्षण को प्राथमिकता दी जाएगी. इस संबंध में केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय के सचिव और IGNCA प्रमुख को औपचारिक पत्र भेजा जाएगा।

साथ ही वार्षिक कार्ययोजना तैयार कर मंत्रिमंडल के समक्ष प्रस्ताव रखा जाएगा. यह निर्णय लिया गया कि प्रदेश के सभी संरक्षित शैलचित्रों और भित्ति चित्रों का जनपदवार सर्वेक्षण, अभिलेखन और कंडीशन असेसमेंट कराया जाएगा, जिसके लिए IGNCA की विशेषज्ञ टीम संबंधित स्थलों का स्थलीय निरीक्षण करेगी।

अपर मुख्य सचिव ने सुझाव दिया कि पहले चरण में चंदौली, सोनभद्र और मिर्जापुर जिलों के शैलचित्र स्थलों से काम शुरू किया जाए. साथ हीं जरूरत पड़ने पर पुरातात्विक उत्खनन भी चरणबद्ध ढंग से कराया जाए‌।

संरक्षण कार्य की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए कार्य शुरू होने से पहले विशेष प्रशिक्षण कार्यशाला आयोजित करने का भी निर्णय लिया गया, जिसमें विभागीय तकनीकी अधिकारियों के साथ ही स्थल पर काम करने वाले कारीगरों और तकनीकी सहायकों को प्रशिक्षित किया जाएगा(साभार एजेंसी)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *